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VOL. 6, ISSUE 1 (2021)
विकासशील देशों में वैश्वीकरण का प्रभावः एक सिंहावलोकन
Authors
आदित्य कुमार
Abstract
यद्यपि कि वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप देशों की समृद्धि बढ़ी है, देशों को आर्थिक लाभ हुआ है मगर वैश्विक आधार पर इसका वितरण प्रायः विषमतापूर्ण रहा है। विकासशील गरीब देश सापेक्षिक रूप से अधिक गरीब हुए हैं क्योंकि उनकी पूंजी, कच्चे माल एवं श्रम-शक्ति का प्रवाह प्रायः अमीर देशों के पक्ष में रहा है। वैश्वीकरण से जो भी लाभ प्राप्त हुआ उसका अधिकांश भाग अमीर देशों के हिस्से में गया है, जिसके परिणामस्वरूप विश्व व्यवस्था पर कुछ अमीर देशों का वर्चस्व स्थापित हो गया है। जिससे राज्यों की श्रेणी में उन्हें अभिजन राज्य की संज्ञा देना गलत न होगा। यदि हम व्यक्तिगत स्तर पर गरीबी की बात करें तो विश्व की तीन चैथाई जनसंख्या आज भी गरीब हैं, जिसमें अधिकांश भाग विकासशील देशों की जनसंख्या का है। वितरण की यह असमानता न केवल राज्यों के मध्य बल्कि राज्य की आन्तरिक सीमाओं में भी व्याप्त है। प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है, मगर प्रति व्यक्ति आय का अवलोकन गरीब व अमीर देशों के मध्य करें तो एक बड़ा अन्तर स्पष्टः दिखाई देता है। एक आंकड़े के अनुसार सन् 1820 में गरीब व अमीर देशों के प्रति व्यक्ति आय में अनुपात 1ः7 का था जो सन् 1992 में बढ़कर 1ः72 हो गया, जो यह स्पष्ट करता है कि वैश्वीकरण के लाभ से गरीब देश वंचित रहे हैं। वैश्वीकरण के विकास के साथ-साथ अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण के परिणामस्वरूप विभिन्न समान हितों वाले राष्ट्र एकजुट हुए हैं। यद्यपि कि सामरिक दृष्टि से दो या अधिक राज्यों के मध्य सहयोग का इतिहास अधिक पुराना है तथापि इसका वृहद स्वरूप हमें बीसवीं सदी में दो महायुद्धों एवं शीत युद्ध के दौरान गठित सैन्य संगठनों जैसे नाटो, सीएटो आदि के अन्तर्गत दिखाई देता है। शीत युद्ध की समाप्ति एवं सोवियत संघ के विघटन तथा वैश्वीकरण ने सामरिक जुड़ाव का परिदृश्य ही पलट दिया है। वर्तमान में आसमान सामरिक हितों वाले देशों, परस्पर विरोधी देशों को एक ही मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है।
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Pages:37-40
How to cite this article:
आदित्य कुमार "विकासशील देशों में वैश्वीकरण का प्रभावः एक सिंहावलोकन". International Journal of Advanced Education and Research, Vol 6, Issue 1, 2021, Pages 37-40
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