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VOL. 3, ISSUE 2 (2018)
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986 में निहित अंतर्विरोध और सामाजिक बहिष्करण एक विश्लेषण
Authors
उमा चतुर्वेदी
Abstract
किसी भी विषय पर किसी राज्य की नीति राज्य और नागरिकों के बीच संबंधो के विशेष प्रकारो को आकार देती है। यही तथ्य राज्य की शिक्षा सग्बन्धी नीति पर लागू होता है। अगर राज्य की शिक्षा सम्बंधी नीति समाजवादी-लोकतंत्र सामाजि-न्याय तथा पंथनिरपेक्षता के सिद्धान्तों पर टिकी होती है तब उसके और नागरिकों के बीच विश्वास तथा बराबरी के संबंध आकार लेते है। ऐसे सिद्धान्तों पर टिकी नीति के कारण उस राज्य के नागरिकों के बीच ऐसे संबंध आकार लेते है। जिससे राज्य में शांति और सद्भाव का वातावरण विकसित होता है। इसलिए राज्य की नीति का समझना एक जरूरी बौद्धिक जिम्मेदारी बन जाती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986 में अनेक उपबंध है। ये उपबंध संवैधानिक मूल्यों के संदर्भ में परस्पर विराधाभासी लगते है। इनमें से कुछ उपबंध सामाजिक न्याय की कसौटी पर खरे नही उतरते। इनकी वजह से नीति सामाजिक-बहिष्करण का माध्यम प्रतीत होती है। इस नीति के कुछ उपबंध देश के नागरिकों के बीच असमतामूलक संबंधांे को जन्म् देने वाले होने के कारण राज्य की सामाजिक समरसता के लिए शुभ नही है।
इस समय भारत अपनी नयी शिक्षा नीति बनाने की प्रक्रिया में है। यह सही समय है जब हमें अपने अतीत की गलतियों से सबक लेकर आगे का रास्ता बनाना चाहिए। सरकार के पास वे तमाम तथ्य है जो उसे भारत की सही स्थिति बता सकेते है। सरकार को चाहिए की वह इन तथ्यों का उपयोग एक ऐसी नीति बनाने में करे जिससे भारत के नागरिक और नागरिक और भी समरसतपूर्ण संबंधों में जी सके।
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Pages:58-60
How to cite this article:
उमा चतुर्वेदी "राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986 में निहित अंतर्विरोध और सामाजिक बहिष्करण एक विश्लेषण". International Journal of Advanced Education and Research, Vol 3, Issue 2, 2018, Pages 58-60
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