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VOL. 2, ISSUE 4 (2017)
सन्त साहित्य की प्रासंगिकता
Authors
डाॅ. पूनम काजल
Abstract
भारतीय संत साहित्य का स्वरूप अत्यन्त व्यापक है। भक्ति-भावना की प्रमुखता के साथ-साथ संतों ने तत्कालीन समाज, धर्म व राजनीति के विविध संदर्भो को उठाकर अत्यन्त ओजस्वी वाणी में अपना साहित्य रचा है। संतों द्वारा व्यक्त विचार तत्कालीन समाज के लिए जैसे उपयोगी थे, उससे भी कहीं अधिक वे आज उपयोगी हैं। यह सत्य है कि समूचा सन्त साहित्य धार्मिक-सामाजिक चेतना से अनुप्राणित है। आधुनिक वैश्वीकरण के दौर में संत साहित्य इसलिए प्रासंगिक है कि वह जाति-व्यवस्था व साम्प्रदायिक कट्टरता जैसी समाज-व्यवस्था का विरोधी है। वास्तव में साम्प्रदायिक सहिष्णुता व भाई-चारे की भावना से ओत-प्रोत सन्त साहित्य आज समूचे विश्व का पथ-प्रदर्शन कर रहा है।
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Pages:66-67
How to cite this article:
डाॅ. पूनम काजल "सन्त साहित्य की प्रासंगिकता". International Journal of Advanced Education and Research, Vol 2, Issue 4, 2017, Pages 66-67
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