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VOL. 1, ISSUE 6 (2016)
‘‘मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद‘‘ आधारित मूल्य शिक्षा के विषय वस्तु एवं पाठ्यक्रमों का स्वरूप
Authors
हिना चावड़ा, डाॅ0 सुरेन्द्र पाठक
Abstract
आदिकाल से ही मानव परंपरा में शिक्षा की बात है यह जंगल युग से ही है। शिक्षा के बारे में मानव चर्चा करते ही आया है। इस क्रम में हमारे देश में वैदिक शिक्षा की बात आयी। दूसरे दश में बाइबिल को शिक्षा में लाने की बात हुई। तीसरे देश में कुरान को शिक्षा में लाने की बात हुई। ऐसे ही विभिन्न प्रकार की शिक्षा परम्पराऐं धरती पर स्थापित हुई। यह क्रम चलते-चलते आज के समय में विज्ञान शिक्षा का सभी देशों में लोकव्यापीकरण हो चुका है। विज्ञान शिक्षा से अपेक्षा थी कि इससे सबकों तृप्ति मिलेगी, लेकिन इससे तृप्ति मिला नहीं। अभी तक जो कुछ भी शिक्षा में आया, उसके ‘‘विकल्प‘‘ के रूप में ‘‘मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद का चेतना विकास मूल्य शिक्षा‘‘ का प्रस्ताव है। मानव ने जीव चेतना में जीते हुए, जीवों से अच्छा जीने के क्रम में शरीर सुविधा से संबंधित सभी वस्तुऐं प्राप्त कर लीं। सारी भौतिक सुविधा की उपलब्धि के बाद भी मानव को शिक्षा से संतुष्टि नहीं मिलीं। इसका मूल कारण है यह है मानव ज्ञान अवस्था की इकाई है और उसको जीव चेतना की शिक्षा से संतुष्टि मिल नहीं सकती। इसलिए ‘‘विकसित चेतना‘‘ के अध्ययन को शिक्षा में लाने के लिए प्रस्ताव है। विकसित चेतना अर्थात मानव चेतना, देवचेतना, दिव्य चेतना।
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Pages:13-15
How to cite this article:
हिना चावड़ा, डाॅ0 सुरेन्द्र पाठक "‘‘मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद‘‘ आधारित मूल्य शिक्षा के विषय वस्तु एवं पाठ्यक्रमों का स्वरूप". International Journal of Advanced Education and Research, Vol 1, Issue 6, 2016, Pages 13-15
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